वाजिद अली शाह और मोहम्मद शाह रंगीला दो ऐसे राजा थे जिन्हे सबसे ज्यादा नाच गाने का शौक था ,

 वाह! क्या दिलचस्प सवाल है! इतिहास में कई ऐसे राजा हुए जिन्हें नाच-गाना बेहद पसंद था, लेकिन अगर “सबसे ज्यादा” की बात करें तो कुछ नाम खास तौर पर मशहूर हैं 👑🎶


🎼 1. वाजिद अली शाह

Image

Image

Image

Image

ये अवध (लखनऊ) के आख़िरी नवाब थे और शायद भारतीय इतिहास में सबसे ज़्यादा नाच-गाने के शौकीन शासक माने जाते हैं।

✨ खुद शायर थे
✨ ठुमरी और कत्थक को बढ़ावा दिया
✨ दरबार में रोज़ संगीत और नृत्य सभाएँ होती थीं
✨ “रहस” नाम से नृत्य-नाटिकाएँ भी लिखीं और मंचित कराईं

लखनऊ की अदब और तहज़ीब में आज भी उनका असर दिखता है।


🎻 2. मोहम्मद शाह रंगीला

Image

Image

Image

Image

मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को “रंगीला” ही इसलिए कहा गया क्योंकि उन्हें रंग-रंगीलापन, संगीत और नृत्य बेहद प्रिय था।

🎶 उनके दौर में दरबारी संगीत बहुत फला-फूला
🎶 कई मशहूर कलाकारों को संरक्षण मिला
🎶 खुद भी संगीत में रुचि रखते थे


निष्कर्ष 🎤

अगर एक नाम चुनना हो तो वाजिद अली शाह को भारत में नाच-गाने का सबसे बड़ा शौकीन शासक माना जाता है।



🎶 दरबार की नाचने वाली (तवायफ़ / दरबारी नर्तकी)

🏵 1. तवायफ़ परंपरा (खासकर लखनऊ और दिल्ली)

Image

Image

Image

Image

  • ज़्यादातर तवायफ़ कहलाती थीं।

  • ये कोई एक “जाति” नहीं थीं, बल्कि एक पेशेवर कलात्मक समुदाय था।

  • कई तवायफ़ मुस्लिम घरानों से थीं, लेकिन कुछ हिंदू परिवारों से भी आती थीं।

  • कत्थक, ठुमरी, दादरा, ग़ज़ल में निपुण होती थीं।

  • लखनऊ (अवध) में तो तवायफ़ संस्कृति बहुत ऊँचे स्तर की मानी जाती थी — वे शायरी, अदब और तहज़ीब में भी माहिर होती थीं।


🎻 दरबार के गायक और बाज़िंदे

🎼 2. गायक (गवैये)

  • दिल्ली और लखनऊ के दरबारों में कई गायक मुस्लिम घरानों (खानदानी उस्ताद) से थे।

  • कुछ हिंदू गायक भी थे, खासकर ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय से।

  • ध्रुपद परंपरा में कई ब्राह्मण परिवार प्रसिद्ध थे।

🥁 3. वादक (सारंगी, तबला, पखावज)

  • सारंगी और तबला बजाने वाले अक्सर पारंपरिक कलाकार परिवारों से आते थे।

  • कुछ क्षेत्रों में ये लोग सामाजिक रूप से निम्न माने जाने वाले समुदायों से भी थे, लेकिन दरबार में उन्हें सम्मान मिलता था।


🎭 क्या “दो खास नाचने वाली” किसी एक जाति से थीं?

ऐतिहासिक रिकॉर्ड में ऐसा नहीं मिलता कि केवल दो स्थायी नर्तकियाँ किसी एक विशेष जाति से थीं।
दरबार में कई कलाकार होते थे, और उनका चयन कला और हुनर के आधार पर होता था, न कि सिर्फ जाति के आधार पर।


🎤 निष्कर्ष

  • “नाचने वाली” कोई एक जाति नहीं थी — यह एक पेशेवर कला समुदाय था।

  • गायक-वादक अलग-अलग धार्मिक और जातीय पृष्ठभूमि से आते थे।

  • दरबारों में कला को प्राथमिकता दी जाती थी, जाति को नहीं (हालाँकि समाज में जातिगत ढाँचा मौजूद था)।


Comments

Popular posts from this blog

अगर के और दाढ़ी के बाल अगर है भूरे, तो यह उपाय आजमाएं और करें कुदरती काले बाल और घने बाल

मेरठ का इतिहास और पूरी जानकारी: कब बना, कैसे बना, कितनी तहसील और गांव

जल्दी स्खलन (Premature Ejaculation): कारण, इलाज और घर पर आसान उपाय